सस्पेक्टेड पोयम्स: गुलज़ार साब संग संवाद

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प्रायोजक: भास्कर भाषा सीरीज़

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

मोहब्बत की शायरी में आपको दुनियावी उलझनों से दूर ले जाने की अजब ताकत है| शायर आपकी मोहब्बत की रूह में उतरकर आपके लिए आपकी ही मोहब्बत का आइना बन जाता है| और शायरी अगर गुलज़ार साब की हो, तो अमूमन वो खुद ही मोहब्बत बन जाती है|

पर इस बार नज्में कुछ अलग थीं| मोहब्बत की कहीं कोई बात नहीं थी| गुलज़ार साब का चहेता ‘चाँद’ कविताओं से गायब था| कहीं न दिल था, न फ़िजायें चमकी थीं, न महबूब का चेहरा आँखों के सामने घूमा था| पेंगुइन इंडिया के साथ आ रही गुलज़ार साब की नई किताब ‘सस्पेक्टेड पोयम्स’ एक अलग आवाज़ है|

सस्पेक्टेड का मतलब संदिग्ध होता है| ये कवितायेँ शक़ पैदा करती हैं| खुद गुलज़ार साब के शब्दों में, “ये वो कवितायेँ हैं जो दिखती कुछ और हैं और हैं कुछ और| इनकी एक पर्त मैं खोलूँगा और दूसरी आप खोलियेगा|”

सस्पेक्टेड पोयम्स गुलज़ार साब की उन कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद है जिनमें कुछ सवाल हैं| सवाल समाज से, हुक्मरानों से, हमसे, आपसे| कैसे पैदा होते ही एक बच्चे के डॉन बन जाने की यात्रा शुरू हो जाती है, क्यों दलित की देह से उठने वाली गंध को नहीं मान पाता समाज ज़िन्दगी की खुशबू, और कैसे कुर्सी पर बैठा नेता कभी उतर कर समझ ही नहीं पता ज़मीनी मुश्किलें| कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद पवन के. वर्मा ने किया है|

ये वो शायरी नहीं है, जिसकी आदत गुलज़ार साब ने अपने पाठकों को डाल दी है| आह इनसे भी उठती तो है, पर वो ठंडी नहीं है, गर्म है, असहज कर देने वाली है| गुलज़ार साब कहते हैं, “मैंने हमेशा आपको दिल की ग़जलें सुनाई हैं पर कभी-कभी मिलकर, बैठकर हमें वतन के बारे में सोच तो लेना ही चाहिए| वतन कहाँ जा रहा है, हम इसे कहाँ ले जा रहे हैं…”

गुलज़ार साब की इस कविता को देखिये-

“मरा नहीं वो,

वो और था कोई जो मरा है,

वहीँ पर देहलीज़ पर पड़ा है!

हुआ यूं था,

किसी ने घंटी बजाई घर की,

वो अपने बच्चों को क-ख-ज-झ सिखा रहा था,

उठा, गया, कुण्डी खोली घर की,

और एक आवाज़ गूंजी गोली की आसमान में,

विचार था उसके सर में कोई जो बोलता था,

विचार देहलीज़ पर पड़ा था,

मरा नहीं वो,

वो और कोई था जो मरा था!’

 

ज़हन के पर्दों को चीर के निकाल जाये ऐसी कवितायें और भी थीं| कॉक्स एंड किंग्स चारबाग़ में, जहाँ करीब 500 लोग आसानी से बैठ सकते हैं, पाँव रखने की जगह नहीं थी| डिग्गी पैलेस होटल की अटारी, सीढियां, यहाँ तक की कैमरामैन का अपना कोना तक गुलज़ार साब के प्रशंसकों से भरा पड़ा था|

पासपोर्ट ऑफिसर वाली कविता सुन कर जाने कितनी आँखें भीग गयीं थीं| ये सिर्फ गुलज़ार साब का ही फन है कि पासपोर्ट जैसी चीज़ से उन्होंने दंगों का दर्द खोल कर रख दिया| अपनी रसोई में एक चाकू पर चलते काले मकोड़े में उन्हें पल-पल शूलों पर चलते दलित का दर्द भी दिखा था|

वो कहते हैं, “ये सब हमारे आस-पास हो रहा है| अगर आपके ऐन्टेना बराबर खुले हैं तो ये सब कहीं आपके भीतर भी महसूस तो होता होगा| मैं ये सब हर रोज़ देखता हूँ| देखते तो आप सब भी हैं, मैं आपकी तरफ़ से लिख देता हूँ|”

गुलज़ार का बच्चों के लिए स्नेह जग-ज़ाहिर है| दीर्घा की एकदम दायीं ओर स्कूली बच्चे बैठे थे| गुलज़ार स्टेज पर अपनी जगह ले चुके थे| पर जब बच्चों ने उन्हें आवाज़ लगायी, तो वो एन स्टेज के दायीं ओर हाथ बाँधकर खड़े हो गये, उनकी बात सुनी, तसल्ली से हाथ बढ़ाकर उन बच्चों को आशीर्वाद दिया, और फिर उसी विनम्रता से वापिस अपनी जगह आकर बैठ गये|

पवन वर्मा के लिए उनका कहना था, “पवन जी ने मेरी कविताओं को स्क्रीनप्ले की तरह अनुवादित किया है| अब मुझे लगता है पवन जी अंग्रेजी की कविता पढ़ दें और मैं उसका हिंदी अनुवाद!”

सेशन ख़त्म होते ही प्रशंसकों ने गुलज़ार साब को घेर लिया| किताबें बाद में साइन करने के वादे के साथ शायर अपनी राह को चला गया|

Photo Credit: Rajendra Kapoor

 

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