लुक बैक इन एंगर: राइटिंग एंड रिमेम्बरिंग

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अजय नावरिया और हरि राम मीणा संग संवाद अनु सिंह चौधरी   

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में दूसरे दिन ‘लुक बैक इन एंगर” सत्र दलित लेखकों के नाम रहा| यूं तो अक्सर ही दलित शब्द सुनते ही एक पीड़ित और शोषित वर्ग की छवि उभरती है लेकिन जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में प्राध्यापक अजय नावरिया को सुनकर आप अपनी सोच बदलने पर मजबूर हो जाएंगे|

अजय नावरिया पेशे से प्राध्यापक होने के साथ ही समकालीन सन्दर्भों पर लिखने वाले सफल प्रतिष्ठित लेखक हैं|

सत्र के मुख्य विषय ‘साहित्य में आक्रोश’ के सवाल पर उन्होंने कहा, “साहित्य का स्थायी भाव आक्रोश नहीं हो सकता| लेखन में समाज के हित पर ध्यान देना चाहिए|”

उन्होंने अपनी बात को आगे विस्तार से समझाते हुए कहा कि एक लेखक के तौर पर समाज के प्रति आपकी कुछ जिम्मेदारी होती है और उसे ध्यान में रखते हुए ही आगे चलना चाहिए|

इसी सवाल का जवाब सत्र के दूसरे वक्ता हरि राम मीणा, जो पुलिस अधिकारी रहे हैं और बहुत सी किताबें लिख चुके हैं, ने कुछ इस तरह दिया कि “जिंदगी का मुख्य भाव रोष ही है और मेरा साहित्य महिलाओं, दलितों, शोषितों की आवाज है| उनके पास न कोई सुविधाएँ हैं, न ही उन्हें कोई सुन रहा है तो उनका आक्रोश साहित्य में ही फूटेगा|”

अभिव्यक्ति के भी अलग-अलग स्वर हैं, और इसके लिए हरि राम मीणा जी ने ढोल की मिसाल दी, जिसे अलग भावों के वर्णन में भिन्न-भिन्न तरीके से बजाया जाता है|

इस सत्र में दोनों लेखक दलित साहित्य पर भिन्न नजरिया प्रस्तुत कर रहे थे, लेकिन बिना किसी विवाद के|

अजय जी ने स्वीकार किया कि “आक्रोश को प्रारंभिक चरण तो माना जा सकता है लेकिन अगर इसे ही पकड़े रहोगे तो समाज का हर वर्ग एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा नजर आएगा|”

हरि राम जी भी पीछे हटने को तैयार नहीं थे| उन्होंने इस संघर्ष को ‘पहचान का संघर्ष बताया’| इसमें एक बड़ी बात उन्होंने ये कही कि कितने गैर-दलित दलितों की समस्याओं पर ध्यान देते हुए लिख रहे हैं| उन्होंने यही सवाल सत्र की संचालक लेखिका और फ़िल्मकार अनु सिंह चौधरी से भी पूछा कि उन्होंने दलितों पर कितना लिखा है| उनके पास भी इसका जवाब न में ही था| इस सन्दर्भ में उन्होंने अपनी किताबों का उदाहरण दिया| उन्होंने कहा कि “कालिदास के ‘मेघदूत’ का मुख्य पात्र यक्ष हमेशा रोता रहता है, मैंने उसी यक्ष को संघर्ष करता, हर चुनौती से कुछ नया सीखते हुए दिखाया है|”

यहाँ ये जानना दिलचस्प रहेगा कि मीणा जी का लेखन मिथकों के किरदार ढूंढकर नई मिसालें गढ़ने की कोशिश करता है| वहीं अजय जी की कहानियों का सन्दर्भ समकालीन घटनाएं हैं|

अजय जी कहानी को कहानी की तरह लिखने का समर्थन करते हैं| उन्होंने कहा कि अगर मुझे समाज की कुरीतियों पर ही लिखना है तो कहानी न लिखकर लेख लिखूंगा|

कहानी में किरदार या तो बहुत अच्छे होते हैं या बहुत बुरे| लेकिन वास्तविक जीवन में कुछ काला या सफ़ेद नहीं होता बल्कि ग्रे होता है|

उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि ऐसा लिखने के कारण बहुत से दलित लेखक “मुझे दलित लेखक ही नहीं मानते”|

उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि “क्यों हम बनी-बनाई छवि से बाहर आने की कोशिश क्यों नहीं करते?”

लेकिन वास्तव में उनका ये सवाल हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर कब तक हमारे मन में दलितों की छवि शोषितों और पिछड़े हुओ की रहेगी, कब तक आदिवासी मतलब जंगल में आधा नंगा तीर लेकर भागता हुआ इंसान दिखाई देगा?

साहित्योत्सवों में होने वाले सत्रों का मकसद भी तो आखिर यही है कि प्रबुद्ध जन सोचने पर मजबूर हो… नए सवाल उठें… नए विकल्प तलाशें जाएं… तो इस सत्र ने ऐसे ही सवाल छेड़ दिए हैं|

 

Photo Credit: Chetan Singh Gill

 

 

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