दिस लैंड इज आवर लैंड

दिस लैंड इज आवर लैंड

मैक्सिमम सिटी: बॉम्बे लॉस्ट एंड फाउंड के लेखक, किरियम प्राइज और हच क्रॉसवर्ड अवार्ड के विजेता और 2005 पुलित्ज़र पुरुस्कार के फाइनलिस्ट सुकेतु मेहता मौजूद थे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पाचवें और दिन के प्रथम सेशन में। मौका था सुकेतु की लिखी किताब 'दिस लैंड इज आवर लैंड' पर चर्चा का। अप्रवासियों पर आधारित इस किताब पर उनके साथ बात करने को मौजूद थे आनंद गोपाल।

अपने परिवार के, भारत से ब्रिटेन और वहां से अमेरिकी अप्रवासी नागरिक के तौर पर तथा विश्व के तमाम क्षेत्रों में अपने तमाम रिपोर्टिंग के अनुभव को साझा करते हुए, सुकेता मेहता ने विश्व भर में हो रहे अप्रवासी विरोध की चर्चा की। उन्होंने इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि पश्चिम में लोग अप्रवासियों के कारण मुश्किल में नही है बल्कि उनकी मुश्किलों का कारण अप्रवासियों से लगातार डरना है। 'दिस लैंड इज आवर लैंड' किताब इस बात की पैरवी करती है कि कैसे उपनिवेशवाद की विरासत और वैश्विक असमानता के कारण विश्व का बड़ा धड़ अप्रवासी बनने पर मजबूर है। अपने अनुभव को साझा करते हुए श्री मेहता ने बताया कि अब जब भी किसी अप्रवासी से ये पूछा जाए कि तुम यहाँ क्यों हो? तो उसे सीधे कहना चाहिए कि हम यहाँ इसिलए है क्योंकि तुम किसी समय हमारे देश में थे। तुम्हारे द्वारा लाये गए सोने चांदी को हम लेने आये हैं। अप्रवासी की महत्ता को बताते हुए मेहता ने कहा कि अप्रवासी अपने साथ उस देश के लिए बेहतरी लाता है तथा उनके आने से देश और समाज समृद्ध होते हैं।

भारत की बात करते हुए श्री मेहता ने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून के कारण विश्व में भारत का नाम खराब हुआ है। इस नाज़ुक हालात में हम इस मुद्दे से दूर नही रह सकते तथा हमें इसके कारण आपस में लड़ाई भी नही करनी चाहिए बल्कि साथ मिलकर हमलोगों को इसका विरोध करना चाहिए। प्राकृतिक एवं मनुष्य निर्मित आपदाओं को वैश्विक मुद्दा बताते हुए श्री मेहता ने कहा कि अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के कारण इस आने वाली शताब्दी का तापमान 4.5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। ऐसे समय में भारत समेत दक्षिण एशिया रहने लायक नही बचेगा। चर्चा के अंत में मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि मैं गुजरात से आता हूँ पर मेरा गुजरात गांधी का गुजरात है नरेंद्र मोदी का नही है।