कितना मज़बूत है हमारा चौथा स्तम्भ ?

कितना मज़बूत है हमारा चौथा स्तम्भ ?

संविधान के अनुसार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका लोकतन्त्र के तीन स्तम्भ हैं लेकिन पत्रकारिता को असंवैधानिक तौर पर लोकतन्त्र का 'चौथा स्तम्भ' का स्थान प्राप्त है। पत्रकारिता ही वह शस्त्र है जिसका इस्तेमाल करके जनता के हित में सत्ता से प्रश्न पूछे जाते हैं। सत्ता को जवाबदेह बनाये रखकर आम नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा तय की जाती है लेकिन वर्तमान में क्या इस 'चौथे स्तम्भ' ने अपनी यह ज़िम्मेदारी निभाई है ? ये, और ऐसे कई गम्भीर प्रश्नों को लेकर 'ज़ी लिट्रेचर फ़ेस्टीवल 2020' के आख़िरी दिन डिग्गी पैलेस के 'संवाद' परिसर में परिसंवाद का आयोजन हुआ।

दैनिक भास्कर' की ओर से आयोजित इस 'चौथा स्तम्भ' सत्र का संचालन लेखिका और पत्रकार रह चुकीं अनु सिंह चौधरी कर रही थीं। संचालिका की ओर से पहला प्रश्न था कि लोकतन्त्र में चौथे स्तम्भ के रूप में मीडिया की वास्तविक भूमिका क्या है तथा आज यह कितना निष्पक्ष और प्रभावी है ? जवाब देने के लिए पत्रकारिता जगत की चार दिग्गज हस्तियाँ मंच पर उपस्थित थीं।

हिन्दी के वरिष्ठ लेखक, सम्पादक, पत्रकार और वर्तमान में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति ओम थानवी ने अफ़सोस ज़ाहिर किया कि अपनी भूमिका की गम्भीरता न समझते हुए मीडिया ने अपनी गरिमा तथा गौरव की अवधारणा को अपने ही हाथों ध्वस्त कर दिया है।आज मीडिया निष्पक्ष नहीं रहा बल्कि कुछ विशेष विचारधाराओं का पक्षधर हो गया है।

दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर अनन्त विजय ने दो टूक बात रखी कि मीडिया का काम है सच दिखाना। जनता के विश्वास ने ही इस संस्थान को 'चौथा स्तम्भ' का दर्जा दिया है। मीडिया की आज़ादी छीनने की और उसकी आवाज़ दबाने की कोशिशें हमेशा की जाती रही है लेकिन यह बचा रहा और आगे भी इसे कोई हिला नहीं सकता। एकपक्षीय पत्रकारिता की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि केन्द्र और परिधि की राजनीति से परे मीडिया सिर्फ़ सच पर आधारित हो।

न्यूजलॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने अपने विचार व्यक्त किये कि मीडिया की भूमिका बहुत गम्भीर है लेकिन इसकी विश्वसनीयता अब ख़त्म हो गयी है। पत्रकारिता में ख़तरनाक बिन्दु तक हो चुके ध्रुवीकरण ने एक 'सफ़ोकेशन' पैदा किया है। रिपोर्टिंग को पीछे कर कर चैनल पर 'लाइव बहस' चलाने की प्रवृति ने शोर मचाकर झूठ फैलाने की परम्परा स्थापित की है। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि मीडिया का काम सही ख़बर देना है, ख़बरों में सन्तुलन करना नहीं।

पाञ्चजन्य के सम्पादक हितेश शंकर ने याद दिलाया कि हमारे तमाम स्वतन्त्रता सेनानी महान राजनेता पत्रकार थे और अख़बार निकालते थे। तब सभी का एक लक्ष्य था 'आज़ादी'। आज़ादी मिलने के बाद 'सामाजिक हितों से जुड़े सरोकारों' को पत्रकारिता का केन्द्र बनना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्होंने वर्तमान में सोशल मीडिया के प्रभाव को स्वीकारते हुए माना कि अब तकनीक ने सबको जानकार बना दिया है। सच को छिपाना अब उतना आसान नहीं रहा।

पत्रकारिता को लेकर तेज़तर्रार पत्रकारों के बीच चली यह बेहद संवेदनशील चर्चा 'अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता' का बेहतरीन उदाहरण रही जहाँ सबने वैचारिक मतैक्य होते हुए भी एक-दूसरे को पूरे सम्मान से सुना। शायद यही इस 'साहित्योत्सव' की ख़ूबसूरती भी है।