सेलिब्रेटिंग बुकसेलर्स: क्युरेटिंग रीडिंग लिस्ट्स

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अनुज बाहरी, प्रीति पॉल, रमण श्रेष्ठा और रिक साइमंसन संग संवाद अर्पिता दास

(दरबार हॉल 10:30-11:30) 18/01/2017

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रकाशन मंच जयपुर बुकमार्क 2017 के संस्करण में पहले ही दिन प्रकाशकों, लेखकों के पसंदीदा और महत्वपूर्ण विषय “किताबें बेचने” पर बात की गई| इस सत्र में किताबों के मशहूर विक्रेता प्रीति पॉल (ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर), अनुज बाहरी (बाहरी एंड संस बुक्स), रमन श्रेष्ठा (रचना बुक्स कम्पनी) और रिक साइमंसन (सिएटल 100) शामिल रहे| सत्र की संचालक थीं प्रकाशक अर्पिता दास|

प्रकाशन जगत का सबसे मुश्किल सेगमेंट “किताबें बेचना” इस सत्र का केन्द्र था| होस्पिटैलिटी इंडस्ट्री को छोड़कर रमन श्रेष्ठा ने अपनी फैमिली की बंद पड़ी बुकशॉप को फिर से शुरू किया| वो ऐसा समय था जब किताबों का काम मंदा था| और हम सभी जानते हैं कि आर्थिक नज़रिये से होस्पिटैलिटी इंडस्ट्री कितनी फायदेमंद है| लेकिन फिर भी उन्होंने इसे छोड़कर गैंगटोक में किताबों की अपनी दुकान में नयी जान फूंकने का फैसला किया और आज वह अपने इस फैसले से काफी संतुष्ट नजर आते हैं| गैंगटोक की उनकी शॉप पाठकों को किताबों के साथ-साथ वहां की ठंडी वादियों में गर्म कॉफी पीने की सुविधा भी देती है| बुकशॉप कम कॉफीशॉप का ये आईडिया जहां उनके लिए फायदेमंद रहा वहीं इस इंडस्ट्री के लोगों के सामने नयी मिसाल भी पेश करता है|

अनुज बाहरी भी अपने परिवार की विरासत को आगे ले जा रहे हैं| एक छोटी सी दुकान से शुरू करते हुए उन्होंने इसे एक ब्रांड में बदल दिया| ये यकीनन एक लंबा सफर रहा, लेकिन उनकी दृढ़ता और मेहनत ने इसे सफलता के अगले पायदान पर ला खड़ा किया| उन्होंने माना कि देश के पूर्वी हिस्से में साहित्य की ज़्यादा पहचान है|

‘किताबों के शहर’ कलकत्ता में पली-बढ़ी प्रीति पॉल का बचपन से ही किताबों के प्रति रुझान रहा| बोस्टन में आर्किटेक्चर की पढ़ाई के दौरान भी किताबों की दुकानों की छोटी-छोटी विशेषता उन्हें आकर्षित करती थी| अगले साल ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर के १०० वर्ष पूरे होने को लेकर वह खासी उत्साहित हैं| ऑक्सफोर्ड में बहुत से बदलाव करके उन्होंने पाठकों के लिए किताब खरीदने के अनुभव को मजेदार बनाया| आज के समय में ऑक्सफोर्ड लेखकों और प्रकाशकों के लिए किताबें लॉन्च करने के बेहतरीन प्लेटफोर्म के रूप में उभरकर आया है और इसका श्रेय यकीनन प्रीति को जाता है, जिन्होंने किताबों की दुकान के पारम्परिक खाके को सिरे से बदल दिया| उन्होंने अफ्रीका में भी ‘कथकली’ नाम से स्टोर खोला है, जहां आप अपनी पसंद की किताबें खरीद सकते हैं| उसकी खासियत उसका ‘वन वूमन शॉप’ होना है, मतलब वहां का हर काम, किताबें पसंद करने से लेकर उन्हें वहां तक पहुँचाने का काम प्रीति ने खुद किया है| जब बुकसेलर इतनी शिद्दत से अपना प्यार सहेज रहे हैं तो पाठक भी भला कैसे उनसे ज्यादा दूर रह पायेगा| उनका मानना है, “हमने लोग किताब ‘क्यों खरीदते हैं, क्यों नहीं खरीदते?’ जैसे मुद्दों पर बारीकी से ध्यान दिया|”

रिक ने माना कि किताबों के बाजार में पिछले कुछ सालों में काफी बदलाव आया है| इसमें महत्वपूर्ण योगदान नई पीढ़ी ने दिया है|

अनुज के अनुसार, “प्रकाशन की वास्तविक कला बुक सेलिंग में ही है|” उन्होंने बताया कि पुस्तक विक्रेता ही किताबों की लिस्ट की देखभाल करता है| इसमें फ्लोर मैनेजर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| ये जानना सच में एक ‘आई ओपनिंग’ मूवमेंट था| जब भी किताबों की बात छिड़ती है तो स्पॉट लाईट लेखक, प्रकाशक और पाठक पर ही आकर टिकती है| अनुज बाहरी ने बताया कि “फ्लोर मैनेजर ही दुकान में आने वाले रीडर्स को जानता है| मैं खुद पांच सालों तक फ्लोर मैनेजर रहा हूँ| मैं कहूँगा कि बुकसेलिंग आर्ट है, ये बहुत मेहनत का काम है|”

प्रकाशन जगत में काम करने वालों का मनोबल बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि बुकस्टोर्स कभी भी ‘आउट ऑफ फैशन’ नहीं होने वाले| जब भी लेखक या पाठक की बात आएगी बुकस्टोर का नाम लिया जाता रहेगा|
Photo Credit: Rajendra Kapoor

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