राजस्थानी : भाषा की मान्यता

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सी.पी. देवल, गीता समुर और के.सी. मालू संग संवाद नंद भारद्वाज     

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

ज़ी जेलएफ का आखरी दिन का यह सत्र राजस्थानी भाषा के नाम रहा| खचाखच भरे दरबार हॉल में श्रोता राजस्थानी के बड़े रचनाकारों, वक्ताओं को सुनने के लिए जुटे थे| साहित्य के इस मेले में भाषा पर चर्चा होना बेहद अहम है| वो भी तब जब समारोह के उद्घाटन सत्र में लोकप्रिय गीतकार, फिल्मकार और कवि गुलज़ार साहब ने गुजारिश की थी कि “विविध भाषा बोलने वाले इस भारत देश में होने बाले सहित्योत्सवों में किसी भी राज्य की भाषा पर केन्द्र दिया जाना चाहिए|”

अकसर मन में सवाल उठता है कि हर क्षेत्र के लोग अपनी भाषा को मान्यता दिलाने को लेकर इतना संघर्ष क्यों कर रहे होते हैं| इसका जवाब इस सत्र में बहुत स्पष्टता से मिलता है कि भाषा का एक बड़ा मसला दरअसल रोजगार से जुड़ा है| सरकारी नौकरी की परीक्षाओं के लिए मान्यता प्राप्त भाषा के छात्र अपनी भाषा में पेपर दे सकते हैं लेकिन राजस्थानी पढ़ने वाला छात्र अपनी भाषा में यूपीएससी स्तर की परीक्षाएं नहीं दे सकता| ऐसे हालात में वास्तव में ये गंभीर मसला हो जाता है|

सत्र संचालक नन्द भारद्वाज ने राजस्थानी भाषा के सत्र की शुरुआत में भाषा की भूमिका बनाते हुए कहा, “किसी भी इंसान की पहचान उसकी भाषा से होती है|” जो पहचान जन्म से लेकर आखिर तक जुड़ी रहती है वो भाषिक पहचान होती है|

अंग्रेजों ने हिंदुस्तान पर राज करने से पहले यहाँ अपनी भाषा का प्रचार प्रसार किया| और भाषा पर प्रहार करके किसी भी देश की जनता को मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा सकता है|

सी.पी.देवल ने ग़ालिब के शेर से बात शुरू की, “हम भी मुँह में जुबां रखते हैं आज पूछो हमसे कि मुद्दा क्या है|” देवल जी ने राजस्थानी भाषा के इस सत्र में अहम सवाल उठाते हुए कहा कि राजस्थान को भारत की भाषा से क्यों ख़ारिज किया?

हर भाषा को किसी भी लोकतंत्र में जगह मिलनी ही चाहिए भले ही उसके बोलने वाले महज कुछ सौ लोग ही क्यों न हों| हमारे कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने राजस्थानी को भाषा की मान्यता दिलाने की लाखों कोशिश की हैं, फिर ये अभी तक क्यों नहीं पाया|

के.सी. मालू जी न सिर्फ़ राजस्थानी भाषा की बड़ी हस्ती रहे हैं, बल्कि राजस्थानी को राष्ट्रीय भाषा में शामिल कराने की कोशिशों में भी शामिल रहे हैं| उन्होंने बताया कि जब कॉलेज स्तर पर उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी साहित्य पढ़ने के बाद राजस्थानी काव्य पढ़ा तो उन्हें महसूस हुआ कि इस पर काफी काम किया जाना बाकी है| “भाषा को मान्यता दिलाने के पीछे सबसे बड़ा कारण उसे हिंदी भाषा में ही सम्मिलित किए जाना रहा| लेकिन राजस्थानी हिंदी से बहुत अलग है| राजस्थानी की अनेकों बोलियों की वजह से भी यह स्पष्टता नहीं बन पाई कि कौन सी बोली को वास्तव में भाषा का दर्जा दिया जाना है|”

इस सत्र में गीता समुर ने लोक नजरिये से भाषा की महत्ता पर प्रकाश डाला| उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से भी इतनी संपन्न है कि इसे सहजता से राष्ट्रीय भाषा में शामिल किया जा सकता है| राजस्थानी भाषा हर दृष्टि से सबल है, “राजस्थान के मारवाड़ी समाज ने अर्थव्यवस्था में अपना परचम लहराया है|” दरअसल भाषा संस्कृति की जड़ होती है, अगर किसी भी कारण से बच्चे अपनी भाषा से नहीं जुड़ पाएंगे तो संस्कृति को भी बचाना मुश्किल हो जाएगा| और ये हर कोई मानता है कि राजस्थानी की संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं|

इस सिलसिले में उन्होंने बॉलीवुड के “निम्बुड़ा, निम्बुड़ा,” गाने का भी उल्लेख किया कि राजस्थानी परम्परा का यह लोकगीत राजस्थान के बच्चे भी फिल्म में देखने के बाद सीख रहे हैं|

ऐसे हर सत्र का मकसद चर्चा छेड़ना है ताकि लोग समस्या को समझें और उस पर ध्यान देने की कोशिश करें|

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