पोएट्री फॉर मासेस: कविता लोगों के लिए

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प्रसून जोशी संग संवाद अनु सिंह चौधरी

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

 

“बाबुल मोहे लोहार के घर दे दीजो,

जो मोरी जंजीरें पिघलाए,

बाबुल मोरे जिया घबराये…”

कुछ इन शब्दों पर ख़त्म हुआ था एक गीतकार, कवि, लेखक प्रसून जोशी का कविताओं पर, जन-कविताओं पर आधारित सेशन| मानते हैं, अंत से किसी लेख की शुरुआत नहीं की जाती| पर इस अंत में एक शुरुआत छुपी है| प्रसून ने यह गीत निर्भया हादसे के बाद लिखा| बिटिया बाबा से कहती है कि मेरा मन बहुत घबराता है बाबा| वो न सोना चाहती है, न महल, न राजा- बिटिया वो साथी चाहती है जो उसकी सदियों की बेड़ियाँ काट दे, जिसमें बंधी हुई न जी पाती है न मर पाती है|

कभी सुनियेगा इस गीत को| आँखें छलछला ही पड़ेंगी| ठीक वैसे ही जैसे स्टेज पर मौजूद मॉडरेटर अनु सिंह चौधरी का गला रुंध गया था| इस गीत से जहाँ प्रसून के विचार झलकते हैं वहीँ खड़ी-बोली की सौंधी खुशबू भी उठती है| ऐसी ही हैं प्रसून की कवितायेँ, गाने, जिंगल- आम भाषा से निकले, आम लोगों के लिए लिखे गये, आम लोगों को जोड़ने वाले| उनकी कवितायेँ पापा से डर की बात करती हैं, माँ से दोस्ती की बात करती हैं, धूप में पड़े सपनों के सिक्कों की बात करती हैं, हंसी को रिवाज़ बनाने की बात करती हैं|

प्रसून आजकल हो रहे लेखन को लेकर बहुत खुश नहीं नज़र आते| अनु सिंह चौधरी से उनका कहना था, “आजकल युवा बड़ी हडबडाहट में हैं| रात को लिखकर रात को ही सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की जल्दी है सबको| छपना अब पहले की तरह मुश्किल नहीं रहा| एक ब्लॉग बना लो, एक फेसबुक अकाउंट और लो छप गये! इस हडबडाहट में अपने लिखे को दोबारा देखना ज़रूरी ही नहीं समझता कोई|”

प्रसून के हिसाब से झील के सामने बैठकर ये लिख देना झील बहुत सुन्दर है और पानी बहुत शांत रिपोर्ट तो हो सकती है कविता नहीं| अपने जाने-पहचाने अंदाज़ में उन्होंने कहा, “हर बार आई लव यू थोड़ी न कहा जायेगा, कभी तो आँखों से छलकती मोहब्बत भी पहचानो यारों!”

ये हडबडाहट थोड़े वक़्त को भले काम कर जाए पर आपको मांझ नहीं सकती| फीडबैक के बिना अपनी गलतियों को समझना बहुत मुश्किल है| आजकल एक और अजीब चलन है| लेखक लिखते हैं और लेखकों को ही सुना लेते हैं| आम पाठक तक न पहुँचने की कोशिश है, न ही पाठक ही अब कवितायेँ सुनने जाया करते हैं|

कविताओं की लोकप्रियता पर प्रसून एक नया नजरिया पेश करते हैं| उनका कहना है भारत एक ऐसा देश है जिसमें गीत के संस्कार मंझे हुए बड़े शायरों ने डाले| कैफ़ी, साहिर, मजरूह जैसे नगीनों ने बॉलीवुड चमकाया| उस दौर में जब सरे बड़े कवि-शायर बॉलीवुड का रुख करने लगे, तब यहाँ एक म्यूजिक की पैरेलल इंडस्ट्री बन पाने की गुंजाइश ख़त्म बराबर हो गयी| आज सारा संगीत- लोक या पॉप बॉलीवुड से होकर गुज़रता है| ऐसे में लिखने वाले पर ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है|

पर ज़िम्मेदारी लिखा हुआ अपनाने वालों की भी है| प्रसून बहुत खुले तौर पर कहते हैं कि कुछ ऐसे गाने जिनमें महिलाओं को वास्तु समझ कर लिखे जा रहे गानॉन की जहाँ एक तरफ तो बड़ी निंदा होती है, वहीँ घरों की बर्थडे पार्टी में इन्हीं गानों पर जश्न मनाया जाता है|

इस तरह के दोहरे मापदंड नहीं चलते| जो अच्छा नहीं हो उसे खरीदो ही मत| बाज़ार बेचना बंद कर देगा|

प्रसून की इस बात पर सारा फ्रंट लॉन तालियों से गूँज उठा था|

अंत में प्रसून ने बाबुल से पहले अपनी नयी किताब ‘धूप के सिक्के’ से तीन और छोटी-छोटी कवितायेँ सुनायीं| इस किताब का अंग्रेजी संस्करण ‘सनशाइन लेन्स’ के नाम से निकाला गया है|

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