परिक्रमा

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नरेंद्र कोहली संग संवाद अनंत विजय    

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

जयपुर साहित्योत्सव के तीसरे दिन का यह सत्र नरेंद्र कोहली और उनके लेखन के नाम रहा| नरेंद्र कोहली अपने समय के प्रख्यात लेखक हैं| उन्होंने लंबे अरसे तक दिल्ली विश्विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया| वो लगभग सौ से अधिक किताबें लिख चुके हैं, जिनमें राम-कथा, कृष्ण-कथा, पांडव कथा और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित उपन्यासों की श्रृंखला शामिल हैं| यकीनन वो पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं|

उनके लेखन की शुरुआत व्यंग्य से हुई, फिर वो आलोचना की तरफ बढ़े, फिर उपन्यास और मिथक|

व्यंग्य से लेखन की शुरुआत करने की कहानी भी बड़ी मार्मिक ही रही| उस दौरान वो अपने जीवन में एक दुखद दौर का सामना कर रहे थे| तो अपने अवसाद को उन्होंने व्यंग्य के माध्यम से बयां किया| लेकिन फिर भी जब कड़वाहट कम नहीं हुई तो आलोचना की तरफ बढ़े| उन्होंने अपने दुःख से बाहर आने एक रचनात्मक माध्यम अपनाया| वो बड़ी निर्भीकता से अपनी बात व्यक्त करते हैं|

मिथक लिखने वालों में कोहली जी हिंदी में यकीनन सबसे बड़ा नाम हैं| नरेंद्र जी अपने मिथक में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पात्रों की इस कद्र व्याख्या करते हैं कि आपको एहसास होता है कि पूरी रामायण और महाभारत को पढ़ने के बाद भी आप उन्हें पूरी तरह नहीं समझ पाते|

यहाँ उन्होंने विवेकानंद पर आधारित अपनी नई किताब ‘प्रत्यावर्तन’ का आधिकारिक विमोचन किया| विवेकानंद पर इससे पहले वो ‘तोड़ो कारा तोड़ो’ नाम से छह किताबों की श्रृंखला लिख चुके हैं और ये किताब उसकी श्रृंखला की अगली कड़ी है|

डिग्गी पैलेस के फ्रंट लॉन में किसी हिंदी लेखक के लिए इतनी भारी भीड़ जुटना यकीनन उनके लेखन के कद को बयां करती है| सत्र संचालक अनंत विजय आईबीएन7 में काफी सालों तक एंकर रहे हैं और अब वो लेखन कर रहे हैं| तो जैसा कि उम्मीद थी उन्होंने कड़े सवालों से सत्र की शुरुआत की, लेकिन कोहली जी के ने भी अपना हर जवाब पूरे प्रमाण के साथ दिया|

अनंत विजय ने सवाल किया कि उन्हें मिथकीय किरदारों को नई रौशनी में पेश करते हुए किसी किस्म का डर या संदेह महसूस नहीं हुआ? इस पर नरेंद्र जी ने जवाब दिया कि “मैं अपने मन के सवालों को सुलझाते-सुलझाते उपन्यास लिख जाता हूँ और इतने सालों में कभी कोई मेरा सिर फोड़ने नहीं आया और न ही किसी ने मुझे कोई गाली दी| सिर्फ़ शुरू में ही एक शिकायती पोस्टकार्ड मेरे पास आया था जिसे मैंने अपनी बात समझाते हुए जवाब दिया तो फिर उससे क्षमा याचना का पत्र भी मुझे मिला| मैं कहूँगा कि यहाँ बहुत सहिष्णुता है|”

नरेंद्र जी का लेखन बहुत गहराई में जाता है और यही उनके बोलने का अंदाज भी है, वो हर बात बड़ी तर्क से कहते हैं और सवाल पूछने वाले को लाजवाब कर देते हैं| सत्र में ऐसे कई धारदार सवाल जवाब पूछे गए|

उनके मिथक को पढ़ना जितना आँखे खोलने वाला एहसास होता है, एक वक्ता के तौर पर उन्हें सुनना भी उतना ही चुटीला| खुद की ओर आने वाली किसी गेंद को वो खाली नहीं छोड़ते| गीता में दिए गए “कर्म” के सिद्धांत पर वो खुलकर कहते हैं कि “कर्म करने से फल कर्म के मुताबिक ही मिलता है न कि मन मुताबिक|”

 

Photo Credit: Chetan Singh Gill

 

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