डिजिटल कंटेंट: बायनरिज ऑफ एम्पावरमेंट

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(दरबार हॉल 11:30-12:30) 18/01/2017

लीला आज़म जेंगें, मार्गरीटा गुएरो, ओसामा मंज़र, सुधा गोपालकृष्णन और विक्रम चंद्रा संग संवाद प्रणब सिंह

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

डिजिटल ऐसा शब्द है जो आप चाहें न चाहें लेकिन आपकी ज़िन्दगी में घुस गया है| आज के संदर्भ में गर बात की जाए तो ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहां डीजीटलाइजेशन ने दस्तक न दी हो — फिर वो चाहे फ़िल्में हों, किताबें हो या फिर बैंकिंग, कृषि, शिक्षा यहाँ तक कि मेहंदी लगाने से लेकर कुकिंग तक सब पर डिजिटल का रंग चढ़ गया है| तो इसी विषय पर जेबीएम के तीसरे सत्र में चर्चा की गई| इसमें वक्ताओं ने नाटक, फिल्म, प्रकाशक, लेखक के नजरिये अपनी बात रखी|

जाने-माने लेखक विक्रम चंद्रा ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि हर प्रकाशक और लेखक आज इस प्लेटफोर्म का इस्तेमाल कर रहा है| डिजिटल कंटेंट ने पब्लिशिंग की दुनिया को बदलकर रख दिया| इससे आपको पाठकों के बड़े वर्ग तक पहुँच हासिल हो जाती है| उन्होंने इसमें ही फ़िल्मी दुनिया में आए बड़े बदलाव की ओर भी ध्यान दिलाया कि कैसे तकनीक के चलते अब बॉलीवुड भी बड़े पैमाने पर फिल्म निर्माण करने लगा है|

बुकवायर स्पेन की निदेशक मार्गरीटा ने इसे लेखक और पब्लिशर दोनों के ही लिए पारंपरिक तरीकों से बेहतर व नया प्लेटफोर्म माना है| उन्होंने यूरोप और लैटिन अमेरिका में काम किया है और वहां डिजिटल दुनिया की दस्तक के बाद आए बड़े बदलाव की बात की|

लेखिका और अनुवादिका सुधा गोपालकृष्णन ने बताया कि नए लोगों ने डीजीटाइजेशन को संभव बनाया| उन्होंने ‘रामलीला’ का उदहारण इस सन्दर्भ में दिया| रामलीला वास्तव में सदियों पुरानी राम की कहानी है जिसे वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक ने अपने-अपने अंदाज से बयां किया है| आज के ज़माने में ये रामलीला के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँच रही है, लेकिन रामलीला का आयोजन इतने बड़े स्तर पर बिना डीजीटाइजेशन के नहीं हो सकता था|

जहां हर वक्ता अपने अनुभव से इसे साबित करना चाह रहा था, वहीं ‘डिजिटल एम्पावरमेंट फाउन्डेशन’ के लेखक और संस्थापक ओसामा मंज़र ने उदयपुर में मिले एक व्यक्ति की दिल को छू जाने वाली कहानी साझा की| उन्होंने बताया, “उस आदमी को डेढ़ सौ गाने मुँह जुबानी याद थे, लेकिन दूसरों तक उन्हें पहुँचाने का कोई माध्यम उसके पास नहीं था| दरअसल वह आदमी लिखा-पढ़ा नहीं था| फिर उसने डिजिटल की ओर कदम बढ़ाते हुए अपने गानों को रिकॉर्ड कर लिया और अब ये धरोहर उसकी आने वाली पीढ़ियों के साथ ही न जाने कितने लोगों के पास पहुंचेगी|”

इस उदहारण के साथ उन्होंने उस मिथक की ओर भी ध्यान दिलाया कि लोग अंग्रेजी नहीं जानने के डर से डीजीटाइजेशन से घबरा रहे थे| लेकिन डीजीटाइजेशन के विजुअल और ऑडियो माध्यम ने उनके इस डर को धत्ता बता दिया| और अब तो गूगल के नए एड में भी आप अपनी भाषा में बोलकर ही सर्च इंजन का इस्तेमाल कर सकते हैं|

पेरिस में जन्मी लेखिका लीला ने भी डीजीटाइजेशन के प्रति लोगों के उत्साह की तारीफ़ की| उन्होंने माना कि इससे हमारी लाइफ काफी हद तक आसान हो गई है, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी दुविधा भी श्रोताओं से साझा की| उन्होंने बताया कि अक्सर इससे उन्हें अपने फोकस में कमी महसूस होती है| ये आज हम सबकी मुख्य समस्या के रूप में उभरकर सामने आ रही है| किसी भी चीज को सर्फ करने में हम न जाने अपना कितना समय यूं ही बर्बाद कर देते हैं|

उनकी इस बात का जवाब लेखक विक्रम चंद्रा ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से दिया| उन्होंने कहा, “ये सागर मंथन की तरह है, जिसमें अमृत के साथ विष भी निकलता है| अब ये आपके ऊपर है कि आप क्या लेना चाहते हैं|”

विषय डीजीटाइजेशन का हो और उसमें कैशलेस या डिजिटल होते भारत की बात न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है| इस मुद्दे पर भी सभी ने एकमत से माना कि कुछ शुरुआती समस्याएँ तो हैं लेकिन हम जुझारू लोग जल्द ही इससे निबट लेंगे|

तो चलते-चलते ये भी बताना जरूरी है कि इस बार जेएलएफ के परिसर में भी कैशलेस सुविधा पर पूरा ध्यान दिया गया है, और खास उसके लिए कई जगह स्टाल मुहैया कराये गए हैं|

 

Photo Credit: Rajendra Kapoor

Lila Azam Zanganeh, Pranab Singh, Sudha Gopalakrishnan, Osama Manzar, Margarita Guerrero and Vikram Chandra

Margarita Guerrero and Vikram Chandra

Pranab Singh

Sudha Gopalakrishnan

Osama Manzar

 

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