कितना कुछ जीवन: मानव कॉल, स्वानंद किरकिरे संग संवाद सत्यानन्द निरुपम

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वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

 

साहित्यिक उत्सव कहानियों, किस्सों और कविताओं का ऐसा समागम होता है, जहाँ आब डूब तो सकते हैं पर निकलना बहुत मुश्किल है| इस मेले में बहुमुखी प्रतिभाओं के ऐसे दिग्गज आते हैं जिनका न ओर है न छोर| स्वानंद किरकिरे और मानव कौल दोनों ऐसे ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार हैं। अभिनय और लेखन से दोनों जुड़े हैं। इसके अलावा भी काफी कुछ है दोनों के जीवन में जो उनको अपने आप में विशिष्ट बनाता है। आखिर एक व्यक्ति एक ही जीवन में कैसे विभिन्न कला-रूपों और अभिव्यक्ति के कई माध्यमों के बीच अंतर्यात्रा करता है? उसके पीछे वह किस मानसिक प्रक्रिया और रचनात्मक तनाव से गुजरता है? जीवन की रिक्ति क्या कला में प्राप्ति बन जाती है? वह क्या है जो एक रचनाकार को तमाम बिखराव के बावजूद सक्रिय बनाए रखता है? थिएटर और बॉलीवुड की दुनिया के दो नामचीन शख्स ने आज राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम से इन सभी सवालों पर खुल कर बात की।

स्वानंद किरकिरे ने अपनी आने वाली किताब ‘आप कमाई’ के आवरण का विमोचन भी किया| पूछे जाने पर कि उन्होंने अपनी किताब के लिए ऐसा नाम क्यों चुना उनका कहना था कि संगीत उन्होंने अपने पिता से पाया था, तो वो उनकी ‘बाप कमाई’ थी| लेकिन कविता उनकी खुद की मिहनत है, इसलिए ये उनकी आप कमाई है|
मानव कॉल दो किताबों के बाद अपनी तीसरी किताब लाने की तैय्यारी में हैं| वे अपने कोरे पन्नों के प्रेम के लिए जाने जाते हैं| उन्हें अपनी तन्हाई से बेइंतेहा मोहब्बत है और वो इसके बारे में खुल कर कहते हैं, “मेरे पास कई शामें, कई रातें खाली, अकेली थीं| जिनमें मैंने अपने अन्दर यात्रा की है|” वो अपने ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कि वे लिख पाए|

मानव कॉल ने सूर्यकांत निराला को अपना प्रेरणा स्त्रोत बताया| वहीँ स्वानंद किरकिरे ने कहा कि उनके लिखें के दरवाज़े गुलज़ार साब ने खोले| उन्होंने अपने लिख पाने का श्री अपने थिएटर के समय को दिया| उन्होंने कहा कि उन्होंने पीयूष मिश्र से सीखा की छोटे समय में, सीमित दायरों में अगर ज़हन सही जगह हो तो बेहतरीन गीत कैसे लिखे जा सकते हैं|

दोनों ही कलाकार रंग मंच से गहरे तौर पर जुडें हैं और अपने जीवन में उसकी एहमीयत मानते भी हैं|

सभा से ये सवाल आने पर कि हिंदी आज के दौर में अपनी पहचान खो रही है और उसे बचाने के लिए क्या किया जा सकता है, दोनों ही लेखकों का एक मत था|

“जो मर रहा है उसे मरने दीजिये| उसकी जगह कुछ ऐसा लेगा जिसकी समाज में ज़रूरत है| आप कितना भी छह कर किसी के ऊपर भाषा थोप नहीं सकते| पाठक आज के दौर में वही पाटा है, जो वो चाहता है|”

उनकी बातों से समाज-विशारक औगस्त कोम्पते के विचारों की महक उठती है|

जनता की मांग पर स्वानंद किरकिरे ने अपने मशहूर गीत ‘तू किसी रेल सी गुज़रती है’ भी गया|

अपने-अपने प्रेरणा-स्त्रोत और रचनात्मक अनुशासन पर हुई इस परिचर्चा के दौरान मानव कौल ने अपनी नई किताब ‘प्रेम कबूतर’ से कहानी का पाठ किया। स्वानंद किरकिरे ने अपने शीघ्र प्रकाश्य कविता-संग्रह ‘आपकमाई’ से काव्य-पाठ किया।

 

Photo Credit: Chetan Singh Gill

 

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