कालजयी प्रेमचंद: टाइमलेस लिगेसी

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कमल किशोर गोयनका संग संवाद सत्यानंद सिंह निरुपम    

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 
‘प्रेमचंद’ ऐसा नाम हैं जिन्हें किताबें न पढ़ने वाला आदमी भी जानता है| वो साहित्य में तो श्रेष्ठ हैं ही किन्तु जनसाधारण में भी इनकी उतनी ही पहचान है… शायद इसीलिए उन्हें कालजयी भी कहा जाता है| जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में दूसरे दिन का “कालजयी प्रेमचंद” सत्र उन्हीं के सम्मान में रहा|

इस सत्र की मुख्य विशेषता रही कमल किशोर गोयनका जी की उनके बारे में दी गई जानकारी| कमल किशोर गोयनका साहित्य जगत का अहम नाम तो हैं ही लेकिन प्रेमचंद के सन्दर्भ में भी वो बहुत ही विश्वस्त और प्रमाणित आवाज माने जाते हैं| उन्हें हाल ही में ‘व्यास सम्मान पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया|

प्रेमचंद के बारे में बात शुरू करते हुए कमल जी ने कहा कि जहां विश्वविद्यालयों में पीएचडी करने के बाद अधिकतर लोग उन पर काम करना बंद कर देते हैं, वहीं मैं उन्हें पढ़ना बंद नहीं कर पाया|

उन्होंने बताया कि उस दौरान उन्हें “प्रेमचंद के बारे में ऐसे तथ्य मिले, जो उस समय के लेखक शायद समझ ही नहीं सके|” इसी में आगे उन्होंने जोड़ा कि दरअसल हुआ यह कि उनकी कहानी ‘कफ़न’ के संघर्ष को ही उनके वास्तविक जीवन से जोड़ दिया गया|

दरअसल प्रेमचंद के बारे में यही कहा जाता रहा कि वो गरीबी में ही जिए और गरीबी में ही मरे| लेकिन कमल जी ने कहा कि “अगर मैं कहूँ ऐसा नहीं था तो आप हैरान हो जाएंगे|” और वास्तव में एक पाठक के रूप में यह मेरे लिए भी हैरानी की ही बात थी|

कमल जी ने प्रेमचंद की ऑटोबायोग्राफी लिखी है तो ये उनके लिए ये और भी ज़रूरी था कि उनके जीवन के किसी एक ही पक्ष को न देखें| तो इसी सिलसिले में उन्होंने सत्र में मौजूद श्रोताओं को भी उनके हैरत में डाल देने वाले नजरिये के बारे में बताया|

उन्होंने बताया कि प्रेमचंद ने लिखा था, ‘भारतीय आत्मा की रक्षा और स्वराज प्राप्ति ही मेरे लिखने का उद्देश्य है|’ प्रेमचंद ने अपने समय को पहचाना और दूरदृष्टि से देश के स्वरूप को समझा| कमल जी ने कहा कि अगर लेखक के सामने भविष्य का स्वरूप नहीं है तो वो बड़ा लेखक नहीं हो सकता|

उनकी भविष्यदृष्टि पर कमल जी ने दिलचस्प वाकया सुनाया| प्रेमचंद जिस समय लिख रहे थे उस समय भारत की जनसँख्या महज तीस करोड़ थी लेकिन फिर भी वो अपने किरदारों के माध्यम से दो बच्चे ही पैदा करने की वकालत किया करते थे| और अपने समकालीन मशहूर साहित्यकार के पहले पुत्र जन्म की बधाई में लिखे पत्र में भी उन्होंने लिखा था कि दो बच्चे होने तक तो मैं बधाई दूंगा लेकिन उसके बाद नहीं|

प्रेमचंद के जीवन के और भी कई अनजाने किस्से उन्होंने सुनाये|

 

 

 

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