कथा से कॉमिक्स: दृश्यामक कहानी कहने क विकास

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अर्पिता दास, जान्हवी प्रसाद, जेसन क्विन, पंकज थापा और रीना पुरी संग संवाद फ़िलिप ए. लुट्जेनडोर्फ़

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

‘80 और ‘90 के दशक में अपने प्री-टीन और टीन-एज में रहा कोई भी पाठक मेरी बात से पूरी तरह सहमत होगा- हमारी हर रेल-यात्रा में मंजिल से ज्यादा इंतज़ार हमें रास्तों का रहता था क्योंकि हर सफ़र के साथी बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी और अमर चित्र कथा हुआ करते थे| ये किरदार हमारे जाने पहचाने थे, हमारे अपने जैसे, और इनकी कहानियां हमारे अपने बचपन से ही कहीं निकाल कर आती थीं|

वक़्त वहां से काफी आगे आ गया है| हमारी कॉमिक्स भी हमारे साथ आगे बढ़ गयीं हैं| आज कॉमिक्स का दायरा सिर्फ एक तरह के कथानक, एक तरह के चित्र नहीं रह गये| इसी बदलाव के बारे में फ़िलिप ए. लुट्जेनडोर्फ़ से बात करते हुए अमर चित्र कथा की एग्जीक्यूटिव एडिटर रीना पुरी का कहना था, “अमर चित्र katha इस साल अपने पचास साल पूरे कर रहा है| इन पचास सालों में छब्बीस मैंने अमर चित्र कथा के साथ गुजारें हैं| आज के पाठक और पिछली पीढ़ी के पाठकों में ज़मीन-आसमान का अंतर है| जहाँ गुज़रे ज़माने के कृष्ण पतले-दुबले हो सकते थे वहीँ आज के बच्चों के लिए गठे शरीर के किरदार ज़्यादा लुभावने हैं|”

34 साल से बच्चों को ग्राफ़िक्स सिखाते आ रहे पंकज थापा का मानना है कि समय के साथ पाठक की मांग भी बदली है| ऐसे में प्रकाशक को पुराने और नए दोनों पाठकों के बीच का सामंजस्य ढूंढना पड़ता है| पंकज की क्विक-कुइप सीरीज आज के दौर में परिवारों पर पड़ रहे तकनीक के प्रभाव पर एक बेहद सफल पहल है|

कॉमिक्स के कथानक की बात की जाये तो स्पाइडर-मैन और बेन-10 जैसी अन्तराष्ट्रीय लोकप्रिय किरदारों से जुड़े और कैम्पफ़ायर ग्राफ़िक्स के क्रिएटिव हेड जेसन क्विन का कहना है, “भारतीय संस्कृति में किरदारों की भरमार है| मैंने एक पुस्तक मेले में यूं ही सीता पर एक कॉमिक्स उठाई थी| उस एक किताब ने मुझे हमेशा-हमेशा के लिए भारतीय संस्कृति से जोड़ दिया| इतना कि मैं कैम्पफ़ायर चला आया| यहाँ के मिथक मेरे बच्चों की रातों की कहानियां बन गये थे|”

जहाँ एक ओर अमर चित्र कथा और कैम्पफ़ायर हैं, जिन्होंने भारतीय मिथकों को बच्चों के प्रिय किरदारों में बदल कर रख दिया है वहीँ दूसरी ओर जाह्नवी प्रसाद हैं, जिन्होंने इंग्लैंड से पढाई पूरी कर के भारत लौटकर, गांधी पर एक अनोखे ढंग से काम किया| उन्होंने महात्मा गाँधी की आत्मकथा “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” के कई हिस्सों को कॉमिक्स के रूप में निकाला और अपनी संस्था यूथ फॉर गाँधी फाउंडेशन के साथ इसे आगे भी बढाया| उनका कहना है, “गांधी गुज़रे ज़माने के भगवान् हैं| जब आप उनकी आत्मकथा पढ़ते हैं तब आपको एहसास होता है कि दरअसल वो भी एक जीते-जागते इंसान थे जिन्होंने अपना जीवन अपनी गलतियों से सीख-सीख कर जिया| ये ज़रूरी है कि आज की पीढ़ी इस बात को समझे|”

नॉन-फिक्शन कॉमिक्स की बात को ही आगे बढाते हुए योडा प्रेस की अर्पिता दास का कहना हैं, “हमने सच्ची घटनाओं पर आधारित कई ग्राफ़िक नावेल किये| ‘दिस साइड देट साइड’ में जहाँ 1971 के [पाकिस्तान-विभाजन का दंश झेलती औरतें हैं, तो वहीँ ‘गर्ल नोट फ्रॉम मद्रास’ इंसानों की तस्करी पर एक सशक्त चोट है| आज का कॉमिक्स सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है|”

पैनल के मध्यस्थ फ़िलिप जो खुद भी 32 साल से आयोवा की यूनिवर्सिटी में पढ़ाते आ रहे हैं, ने सभा समाप्त होने से पहले कहा कि ग्राफ़िक्स आने वाले समय में शिक्षा का एक बड़ा माध्यम बनेगा| “ग्राफ़िक्स वो सब है जो आप पन्ने दर पन्ने लिख कर समझाना चाहते हैं| कई ग्राफ़िक्स तो आपसे शब्दों की मांग ही नहीं करते| ज़रूरी है कि हम ग्राफ़िक्स की इस ताकत को समझें|”

 

Photo Credit: Rajendra Kapoor

 

 

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