आफ्टर द एंग्री यंग मैन, द ट्रेडिशनल वुमन-व्हाट?: गुस्सैल नौजवान के बाद अब क्या पारंपरिक भारतीय महिला की बारी है?

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जावेद अख्तर संग संवाद रेचेल डायर

प्रायोजक: द रियल वुमन सीरीज़, डव द्वारा प्रेषित

 

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

 

जावेद अख्तर एक ऐसा नाम है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं| जावेद साब की शख्सियत उनकी फिल्में, उनकी कवितायेँ, उनके गाने पिछले चार दशक से हिन्दुस्तान और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बयान कर रहे हैं| लेकिन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सबकुछ लीक पर चल कर कहाँ होता है? ये सेशन जावेद साब की कविताओं या गानों पर नहीं बल्कि फिल्मों में तेज़ी से बदलती हिन्दुस्तानी औरत की छवि पर एक विचार था|

रेचेल डायर से बात करते हुए जावेद साब ने कहा, “बीते दशकों में आप स्क्रीन पर आते बदलावों को आसानी से पकड़ सकते हैं| ऐसा नहीं है कि हीरो के किरदार नहीं बदले| लेकिन परदे पर हिन्दुस्तानी औरत बेचारी, दुनिया-जहाँ की लानत झेलकर भी चुप रहने वाली, पति की सेवा करने वाली माला सिन्हा या आशा पारीख से ‘ज़िन्दगी न मिलेगी दुबारा’ की कटरीना कैफ़, जो अपने आप में संपन्न है, पूर्ण है, आत्मविश्वास से भरी हुई है- तक का सफ़र तय कर आई है| ये अपने आप में एक कामयाबी है|”

फिल्मों के नामों पर बात करते हुए जावेद साब का कहना था हमने ‘मैं चुप रहूंगी’ से लेकर ‘पिंक’ तक फिल्मों में महिलाओं की आवाज़ के सिरे से बदलते देखा है| आज की फिल्में एक औरत को मुख्य किरदार बनाकर लिखी जा सकती हैं और चलती भी हैं|

जावेद साब का मानना है कि फिल्मों में इस बदलाव का एक बड़ा कारण ऑडियंस में आये बदलाव भी हैं| आज की ज़्यादातर ऑडियंस चालीस साल से कम उम्र की है| पहले के बनिस्बत ज़्यादा लोग हॉल में पिक्चर देख पाते हैं| ज़ाहिर सी बात है, फिल्में वैसी ही बनेंगी जैसी उनको देखने वालों की मांग रहेगी|

पहले की फिल्मों में औरतों के एकदम सफ़ेद या एकदम काले किरदार बनाये जाते थे| जावेद साब कहते हैं, “एक वैम्प होती थी, जिससे दरअसल वो सब कराया जाता था जो हम सच में करना चाहते थे| और एक कोमल, सीधी सी हेरोइन होती थी जो  सारे गम खा कर भी चुप रहती थी| हम इस हेरोइन से आदर्श गढ़ते थे|”

पर समय के साथ आदर्श बदलते हैं| ’60 से लेकर ’80 तक के दशक में पैसेवाले लोग, भले वो ज़मींदार हो या बड़े उद्योगपति, विलन हुआ करते थे| उनका पैसेवाला होना उन्हें अपने आप विलं बना देता था| आज के हीरो और हेरोइन दोनों ही फिल्मों में एक अच्छी ज़िन्दगी की चाह रखते हैं| आज की महिला सशक्त है, ज्यादा समझदार है और आत्म निर्भर भी है|

जावेद साब का मानना है कि पिंक जैसी फिल्मों एक नयी लीक स्थापित की है| ऐसी फिल्में समाज के बुज़ुर्ग वर्ग में भी खुले, नए विचारों की अपनाइश का आयना हैं| इनसे उम्मीद मिलती है|

अपने प्रशंसकों की एक स्वर मांग पर जावेद साब ने सेशन के आखिर में अपनी नयी कविता “किसी का हुक्म है” भी सुनाई|

 

Photo Credit: Rajendra Kapoor

 

 

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