आधुनिकता एक खोज: द सर्च फॉर मॉडर्निटी

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अनु सिंह चौधरी, मृणाल पांडे और सौरभ द्विवेदी संग संवाद अदिति महेश्वरी गोयल

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

 

आधुनिकता- मॉडर्निटी: आज के दौर में ऐसे शब्द हैं जिनकी परिभाषा वृहद् है| पहले इस पैनल से आपका परिचय कराये देते हैं| मृणाल पांडे अपने आप में एक संस्था हैं| वे अकादमिक हैं, लेखक हैं और हिन्दुस्तान अखबार की पहली महिला मुख्य सम्पादक थीं| अनु सिंह चौधरी एक वरिष्ठ पत्रकार रह चुकी हैं, फिल्मकार हैं और अब अपनी नयी वेब सिरीज़ ‘द गुड गर्ल शो’ को जल्द सबके सामने पेश करने वाली हैं| सौरभ द्विवेदी, अपनी ही भाषा में, लल्लनटॉप वेबसाइट के ‘मुखिया’ हैं| ‘हिंदी दो दशमलव अंडा’- यानि हिंदी वर्शन 2.0 उनकी यू.एस.पी है| हिंदी 2.0 आम बोलचाल की भाषा में लिखी गयी हिन्दी है, जिसमें बोलियाँ भी हैं और अंग्रेजी भी| मॉडरेटर अदिति महेश्वरी गोयल हिंदी प्रकाशक जगत का बड़ा नाम है| वे वाणी प्रकाशन की निदेशक है|

पैनल के इस छोटे से परिचय से आप ये तो समझ ही गये होंगे कि क्यों इस सेशन के लिए इससे बेहतर पैनल चुन पाना मुमकिन नहीं था| जहाँ मृणाल जी अपने साथ तीन दशक से ज्यादा का अनुभव लेकर आती हैं वहीँ सौरभ और अनु युवा मन के प्रतिनिधि हैं| इनके हिस्से हिंदी को ‘कूल’ बनाने का समय आया है|

मृणाल जी कहती हैं, “हर पीढ़ी को अपने से पीछे वाली पीढ़ी ‘भुडभासी’ ही लगती है| फिर मैं तो डायनासोर के ज़माने की हूँ| पर मेरी समझ में अक्लमंद पीढ़ी वही है जो हर पुराने को बेकार न समझे| हर पुराना बेकार नहीं होता| वक़्त के हिसाब से बदलाव ज़रूरी हैं पर सिरे से ख़ारिज कुछ नहीं होना चाहिए|”

मृणाल जी की ही बात को आगे बढाते हुए सौरभ कहते हैं, “140 चरेक्टेर्स वाले इस दौर में नैरेटिव खोता जा रहा है| बचपन का भी हर दिन नहीं याद होता| किस्सा याद होता है जब माँ ने चोट पर दवा लगाकर प्यार से आलू खिलाया था| हम अपनी हिंदी से किस्से को भुला दे रहे हैं| आधुनिक वही है जो आज है| मेरे आज का वक़्त मेरा सच है, मेरे लिए यही आधुनिक है|”

इस पर अदिति ने जब अनु सिंह चौधरी से ये सवाल किया कि क्या इसका मतलब है कि हमें लॉन्ग-फॉर्म जर्नलिज्म को वापिस अपना लेना चाहिए तो अनु का कहना था, “आधुनिकता की खोज अमर है, कभी शांत न होने वाली है| ज़रूरी ये है कि हम अपने आज को समझें| जो आज की ज़रूरत है वही आज की अग=धुनिकता है| वो भी मैं हूँ जो अपने ससुराल में सर ढकती है चूड़ियाँ पहनती है, और वो भी मैं हूँ जो जर्मनी में वेस्टर्न कपड़े पहनकर आइस-क्रीम खाती है|”

अनु का मानना है कि अगर शाख आसमान छू रही है तो जड़ों को कमज़ोर तो नहीं किया जा सकता|

जड़ों की बात पर लौटते हुए मृणाल जी का कहना था कि भारतेंदु भी हिंदी की आधुनिकता पर बात करते थे, हम भी कर रहे हैं| इस बड़े अंतराल में जो भाषा की शुद्धिकरण का दौर आया ये बड़ा खतरनाक है| दरअसल पहले तो फ़ारसी ही शाही भाषा थी| उससे बिखर कर दो धाराएं आयीं, हिंदी और उर्दू- एक दूसरे हकी पूरक, पोषक| और इनको सांस दी बोलियों ने|

पर सियासी खींचतान में एक छायावाद को चली गयी एक ने गम की शायरी ओढ़ ली| मुकम्मलतौर पर एक की भी आवाज़ बुलंद नहीं हों पाई| अब हम झगड़ते रहते हैं कि असल हिंदी है क्या?

इस पर सौरभ का मानना था कि हिंदी वाले जुझारू नहीं होते| पढने में चोरी करते हैं| अपनी ही पुश्तैनी ज़मीन को निखारना नहीं जानते|

इसी में अनु सिंह ने ये भी जोड़ा कि सिर्फ जुझारू नहीं इमानदार होने की भी ज़रूरत है| इस पर अदिति ने अनु की किताब ‘नीला स्कार्फ’ का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी 12 कहानियों के हर किरदार की अपनी हिंदी है| क्योंकि कई तरह की हिंदी हैं और किसी से उसकी हिंदी छीनी नहीं जा सकती| उनकी आने वाली वेब सीरीज में भी उन्होंने इस बात का ख़ास ख्याल रखा है|

सेशन के आखिर में सभी पैनलिस्ट इस बात को स्वीकार रहे थे कि शुद्ध हिंदी को लेकर कट्टर होना दरअसल भाषा का ही विकास रोकता है|

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