आईडिएट- फ्रीडम टू ड्रीम: सोचो: सपने देखने की आज़ादी

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प्रसून जोशी संग संवाद पुनीता रॉय

प्रायोजक: भास्कर भाषा सीरीज़

 

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

असल हुनर किसी पेशे, किसी रोक का मोहताज नहीं| सपने बंद कमरों से भी परवाज़ भर लेते हैं| आँखों को अपने कल को देखने के लिए दीवार में खिड़कियाँ नहीं चाहिए| कुछ ऐसी ही बातें प्रसून जोशी पर लागू होती हैं|

एक ऐसे समय में जब विज्ञापन जगत और अच्छा लेखन एक दूसरे से बहुत दूर होते जा रहा है, प्रसून जोशी का नाम एक पुल की तरह सामने आता है| विज्ञापन जगत में अपनी पैठ जमा चुके प्रसून ने न ही केवल फ़ना और तारे ज़मीन पर जैसी फिल्मों के लिए गाने लिखे बल्कि बड़े परदे को चमका देने वाली फिल्म, भाग मिल्खा भाग भी लिखी|

प्रसून ने अपना कविता संग्रह सत्रह साल की उम्र में लिखा था| उनका कहना है, “देखिये! पहली किताब चली नहीं! उम्र ने मुझे बहुत जल्दी सिखा दिया था कि बेटा! सिर्फ शायरी करके तू अपना घर नहीं चला पायेगा|”

वो समझ गये थे कि कविता उन्हें नहीं पाल सकती थी, तो उन्हें ही कुछ वक़्त तक कविता को पालना होगा| उन्होंने कुछ प्रोफेशनल कोर्स किये, जिनमें वो लोगों से बातचीत कर सकें, लिख सकें और कमा भी सकें| एडवरटाइजिंग ने ये मौका बड़ा खुलकर दिया|

एक उत्पाद को बेचने में भावनाएं लगती हैं| देश को ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ सिखाने वाले प्रसून कहते हैं कि हर उत्पाद की अपनी विशेषताएं हैं| आपको ग्राहक के मन में इन्हीं विशेषताओं को एक भावना की तरह बिठा देना होता है| यही ब्रांडिंग है| अपने कोका कोला के ऐड के लिए उन्हें कान्स लायंस अवार्ड भी मिला है|

प्रसून कहते हैं एडवरटाइजिंग विशुद्ध प्रचार है| वो किसी को बेवकूफ नहीं बना रहे| सबको पता है कि यहाँ उत्पाद बेचा जा रहा है| अब एक ऐसे देश में जहाँ लोग पान खा-खाकर अपने दांत लाल-पीले कर लेते हैं, ऐसे ऐड पर विश्वास करना मुश्किल होगा जहाँ कोई किसी की गर्लफ्रेंड सिर्फ इसलिए बन जाये कि लडके के दांत सफ़ेद हैं| लोग ऐसे ऐड पर विश्वास नहीं करते|

प्रसून को अपनी जीवनसाथी भी बीस साल इसी ऐड इंडस्ट्री में मिलीं थीं| प्रसून ने पुनीता रॉय को बताया, “अपर्णा तब मेरी मेनेजर थीं| मुझ बेलगाम घोड़े को वो तब भी लगाम लगा के संभालती थीं, आज भी संभालती हैं|”

जैसे हर पिता के लिए होती है, प्रसून के लिए भी अपनी बेटी बेहद ख़ास है| प्रसून जब ‘तारे ज़मीन पर’ के लिए गाने लिख रहे थे, तब उन्होंने दरअसल अपने और अपनी बेटी के रिश्ते को ही गीतों में बाँध दिया था|

प्रसून एक बेहद स्नेही पिता तो हैं ही, साथ ही एक बहुत ही समर्पित बेटे भी हैं| उनका कहना है, “आपके माँ-बाप की दुनिया उम्र के साथ सिमटती जाती है| धीरे-धीरे उनका सबकुछ आप पर आकर रुक जाता है| ज़रूरी है कि आप उन्हें अपनी दुनिया का हिस्सा बनाये रखें| जब आपको ज़रुरत थी, वो आपकी दुनिया के केंद्र में थे| आज बारी आपकी है, और आपको पीछे नहीं हटना चाहिए|”

वे अपने माँ-बाबा को अपनी ज़िन्दगी से जोड़ कर रखते हैं| क्या हो रहा है, कैसे चल रहा है, कौनसी फिल्म कर रहे हैं- सबके बारे में बात करते हैं| प्रसून का मानना है ऐसा करने से उनके माता पिता उनसे आराम से बात कर पाते हैं| बाहरी नहीं महसूस करते| प्रसून की ये बातें युवा ऑडियंस को कहीं बहुत गहरे तक छू गयी थी| भीगी आँखें कई कोनों में देखि जा सकती थीं|

प्रसून ने सालों पहले के लिखे अपने गाने ‘डूबा-डूबा रहता हूँ’ गाकर पहले ही मोहित सभा को और बाँध लिया| उनके पुराने प्रशंसकों की भीड़ में कई ऐसे भी थे जो उन्हें पहली बार सुन रहे थे| और जो सेशन ख़त्म होते होते उनके मुरीद हो गये थे| चाहे प्रंशसकों के गाने की मांग हो या अपनी कविता सुनाने की इल्तजा, प्रसून ने सबका आदर किया|

हालाँकि सभा सेशन लम्बा करवाना चाहती थी, घडी की सुइयों ने समय को विराम दे दिया था| प्रसून फिर मिलने का वादा करके अपनी बुक-साइनिंग के लिए चले गये|

 

Photo Credit: Chetan Singh Gill

 

 

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