अकबर : कितना इतिहास, कितना उपन्यास

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शाज़ी ज़मां संग संवाद रवीश कुमार

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

डिग्गी पैलेस के खचाखच भरे चारबाग में पत्रकार रवीश के लिए दीवानगी देखी जा सकती थी वहीं हिंदी में इतनी शोध के बाद लिखा गया जाने पत्रकार और लेखक, शाज़ी ज़मां के उपन्यास “अकबर” ने भी श्रोताओं का ध्यान खींचा| “अकबर” की खासियत ये है कि हिंदी में ऐसे वृहद उपन्यास कम लिखे जाते हैं| भली प्रकार से रिसर्च करके लिखे गए उपन्यास आज के समय में हिंदी तक अनुवाद के माध्यम से ही पहुँचते हैं|

ये उपन्यास लेखक ने कल्पना के बूते पर नहीं, बाज़ार से दरबार तक के ऐतिहासिक प्रमाण के आधार पर रचा है। बादशाह अकबर और उनके समकालीन के दिल, दिमाग़ और दीन को समझने के लिए और उस दौर के दुनियावी और वैचारिक संघर्ष की तह तक जाने के लिए शाज़ी ज़माँ ने कोलकाता के इंडियन म्यूज़ियम से लेकर लंदन के विक्टोरिया एल्बर्ट तक बेशुमार संग्रहालयों में मौजूद अकबर की या अकबर द्वारा बनवायी गयी तस्वीरों पर ग़ौर किया, बादशाह और उनके क़रीबी लोगों की इमारतों का मुआयना किया और ‘अकबरनामा’ से लेकर ‘मुन्तख़बुत्तवारीख़’, ‘बाबरनामा’, ‘हुमायूंनामा’ और ‘तज़्किरातुल वाक़यात’ जैसी किताबों का और जैन और वैष्णव संतों और ईसाई पादरियों की लेखनी का अध्ययन किया। इस तरह बनी और बुनी दास्तान में एक विशाल सल्तनत और विराट व्यक्तित्व के मालिक की जद्दोजहद दर्ज है । ये वो शख़्सियत थी जिसमें हर धर्म को अक़्ल की कसौटी पर आँकने के साथ-साथ धर्म से लोहा लेने की भी हिम्मत थी। इसीलिए तो इस शक्तिशाली बादशाह की मौत पर आगरा के दरबार में मौजूद एक ईसाई पादरी ने कहा: “ना जाने किस दीन में जिए, ना जाने किस दीन में मरे”।

ऐसी ही शख्सियत थे अकबर| शाज़ी ने इस किताब में बादशाह अकबर के निजी जीवन और एक इंसान के तौर पर उनकी शख्सियत को उभारा है| रवीश के मन भी किताब पढ़कर वही सवाल आया जो शायद वहां मौजूद हर शख्स के मन में था, “ये इतिहास है, साहित्य है या उपन्यास|”

शाज़ी ने बताया, “ये उपन्यास तो है लेकिन इसके लिए मैंने अकबर के इतिहास की बहुत बारीकी से जांच की है| ये जांच न जाने कितने सालों से चल रही थी, अब तो मुझे लगता है मैं बचपन से यही कर रहा था|”

रवीश ने किताब से कई रोचक किस्से पढ़कर सुनाये| इसमें एक शुरुआती अंश है:

3 मई 1578 की चाँदनी रात को लोगों ने हिंदुस्तान के बादशाह अबुल मुज़फ़्फ़र जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को एक ऐसी कैफ़ियत में पाया जिसे उस वक़्तहालाते अजीबकहा गया। बादशाह के दूर या क़रीब, कोई इस दीवानगी जैसे हाल को पूरी तरह समझ नहीं पाया। उस वक़्त मुग़ल बादशाह का लश्कर झेलम नदी के किनारे तैनात था… और अब वो वक़्त आ पहुँचा जब शिकार बादशाह सलामत के पहले वार के लिए तैयार था। लेकिन उस मुक़ाम पर आकर बादशाह अकबर ने एक हैरतंगेज़ क़दम उठा लिया…

अकबर की हुकूमत का डंका पूरी दुनिया में बजता था। उस दौर के बेहतरीन लोग हुकूमत की ताक़त, उसकी दौलत और उसके वैभव की वजह से दरबार की तरफ़ खिंचे चले आते थे। लेकिन सिर्फ़ यही वजह नहीं थी। दरअसल लोग धर्म और धारा के प्रति बादशाह के नजरिये को लेकर हैरान थे| अकबर सही मायनों में एक धर्म निरपेक्ष राजा थे| किताब के कवर पर अकबर की ढाल का चित्र अंकित है| उस ढाल पर हिंदू धर्म की बारह राशियों के साथ सूर्य का चित्र भी अंकित है| अकबर सूर्य के उपासक रहे थे|

सत्ता के शीर्ष पर खड़ा ये बादशाह अपनी ज़िंदगी में कभी कोई जंग नहीं हारा। लेकिन अब एक बहुत बड़ी और ताक़तवर सत्ता उसके सब्र का इम्तिहान ले रही थी । बादशाह अकबर का  सब्र टूट रहा था। वो अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला लेने को थे। संघर्ष का एक नया दौर शुरू हो रहा था। इसी दौर का वर्णन इस किताब में किया गया है|

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