सुर संगीत साहित्य: संगीत के लिए लेखनी

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मृणाल पांडे एवं यतीन्द्र मिश्र संग संवाद विद्या शाह

प्रायोजक: रेड एफ़.एम्

 

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

साहित्य और संगीत का रिश्ता बहुत पुराना है| जाने कितनी ही बार साहित्य के गर्भ से कालजयी संगीत ने जन्म लिया है| लेकिन सुर, संगीत और साहित्य नाम का ये सेशन साहित्य के बारे में नहीं था| बल्कि संगीत के साहित्य के बारे में था| प्रसिद्ध गायक, समाज सेविका और लेखक विद्या शाह का कहना था कि वो खुद को सुर की तरफ ज्यादा देखती हैं|

लम्बे अरसे तक हिन्दुस्तान अखबार की सम्पादक रहीं मृणाल पांडे का सुर के बारे में कहना था, “जो खुद विराज सके, जो अपनी रौशनी से चमके वो सुर है|” मृणाल जी का कहना है कि वो एक लम्बे अरसे तक साम वेद, जिसे भारतीय संस्कृति में संगीत का जनक माना जाता है, पूज्यनीय था| संगीत आम लोगों के लिए था ही नहीं| माना जाता है कि शिव ने तांडव करके सुरों को बंधन से मुक्त किया था| इसके बाद ही संगीत आम लोगों तक पहुँच पाया|

संगीत के साथ एक बड़ी त्रासदी ये है कि उसका कोई साहित्य बनाने की कोशिश ही नहीं की गयी| बल्कि जब बड़े राजाओं ने उस्तादों से उनके ख्याल लिखने को कहा तो वे साफ़ मुकर गये| सुरों को शब्दों में बांधना किसी के लिए भी आसान नहीं था|

ऐसे में यतीन्द्र मिश्र का परिचय ज़रूरी होता है| यतीन्द्र एक सुसज्जित कवि-लेखक हैं जिनका संगीत से गहरा नाता है| वाणी प्रकाशन के साथ आई उनकी किताब लता-सुरगाथा खासी चर्चा में है| इस किताब में यतीन्द्र ने लता जी के सत्तर साल के वृहद् अनुभव को साहित्य का रूप देने की कोशिश की है| वक्त के साथ रागदारी संगीत, वो संगीत जिसका आधार राग हो, का चलन बढ़ा| संगीत की उम्र तीन मिनिट की होने लगी| एक तीन मिनट का गाना संगीत की सफलता का पयमाना बन गया| जिस वक़्त लता जी इंडस्ट्री में आयीं, संगीत निदेशक एक ‘परफेक्ट आवाज़’ की खोज में थे|

उस समय बंदिशों का, ठुमरियों का, चैतियों का दौर था| मृणाल जी इस बारे में कहती हैं, “भारतीय संगीत हर पल विकसित हुआ है| हिन्दुस्तान में संकरण, यानि एक दूसरे में घुल-मिल जाने की ग़ज़ब प्रथा है, संस्कृति है| संगीत इसकी सबसे बड़ी जीती-जगती मिसाल है|”

अपनी किताब जलसा पर बात करते हुए विद्या शाह का कहना है कि उन्होंने गुज़रे दौर की नाच-वालियों पर काफी शोध किया| दरअसल यही नाच-वालियां या तवाइफें ग्रामोफ़ोन कंपनियों के लिए रिकॉर्डिंग करती थीं|

इसी बात में यतीन्द्र आगे कहते हैं, “जाने कितनी तवाइफ़े उस वक़्त नाम बदल कर मिस टोपाज़, मिस रोज़, मिस प्रीटी हो जाया करती थीं| ये दरअसल वही बिट्टन, लिट्टन और मुन्नी थीं जिनका नाच और गायन का काम धीरे-धीरे मंदा हुआ| कभी जोर-ज़बरदस्ती से, कभी मन से इन्हीं औरतों ने ग्रामोफोन के लिए रिकॉर्डिंग की|”

मृणाल जी इन्हीं औरतों को शास्त्रीय संगीत को जिंदा रखने का श्रेय भी देती हैं| “कजरी, चैती जैसे ग्राम गीत दरअसल औरतों ने बचाए| बड़े उस्तादों ने कितनी ही बार गाने तक से मना कर दिया| उस वक़्त अगर इन औरतों ने कमान नहीं संभाली होती, तो आज हमारे पास संगीत की धरोहर बची ही न होती|”

विद्या शाह का कहना था उनको आज के समय में डी.जे क़वाल्ली का हिसाब-किताब कम समझ आता है| उनका मानना है उन्होंने क़वाल्ली की खूबसूरती को जिया है और शायद इसिलिये इस नयी रीत के साथ ताल-मेल बिठाना उन्हें ज़रा मुश्किल लगता है|

इसपर सभा ने उनसे सवाल भी किया के आज के युवा शास्त्रीय संगीत को कैसे समझें| विद्या का कहना था कि हम बेहद भाग्यशाली हैं कि हमारे पास आज इन्टरनेट है| यूट्यूब गूगल के दौर में कुछ हाथ के बाहर नहीं है|

मृणाल जी और यतीन्द्र दोनों का ही मानना था कि हमने शास्त्रीय संगीत को शास्त्रीय कह-कह कर ही बढ़ने से रोक दिया है| वास्तु कला, चित्रकारी सब मॉडर्न हो गये, बस एक नृत्य और संगीत को शास्त्रीय के डब्बे में फंसा दिया गया है| युवाओं में नीरसता और उदासीनता आना तो स्वाभाविक ही था फिर!

सेशन के आखिरी में यतीन्द्र मिश्र ने अपनी किताब लता-सुरगाथा और विद्या शाह ने अपनी किताब जलसा प्रशंसकों के लिए साइन करीं| खचाखच भरा बैठक का हॉल डेढ़ घंटे तक सांस खींचे तीनों वाचकों को सुनता रहा था|

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