पुराण

blog-image-3-resized

बिबेक देबरॉय, पुष्पेश पन्त संग संवाद जिम मेलिंसन

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

पुराण और मिथक ऐसा विषय है जो एक बार फिर से युवाओं को भा रहा है| मुझे याद है कि नब्बे के दशक में पुराण या मिथक मैंने सिर्फ़ साहित्य की छात्रा होने की वजह से पाठ्यक्रम के रूप में ही पढ़ा था| मिथकों को शौकिया पढ़ने या उनके बारे में ज्यादा गहराई से जानने का चलन उस समय नहीं था| लेकिन आज के संदर्भ में देखा जाए तो मानो हर कामयाब लेखक वही लिख रहा है, और पब्लिशिंग जगत से जुड़ी होने की वजह से मैं जानती हूँ कि वही बिक भी रहा है| देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी, अश्विन सांघी, आनंद नीलकंठन जैसे अधिकांश बड़े और कामयाब लेखक अपनी किताबों में किसी न किसी रूप में मिथक को ही प्रस्तुत कर रहे हैं|

शायद यही कारण है कि ज़ी जयपुर साहित्योत्सव में भी मिथक और पुराण से जुड़े कई बेहतर सत्र आयोजित किए जाते हैं| संडे की सुस्त सुबह को भी डिग्गी पैलेस के चारबाग में “पुराण” सत्र आयोजित था| इसमें नामी अर्थशास्त्री और लेखक बिबेक देबरॉय, प्रोफेसर, स्तंभकार, फ़ूड क्रिटिक पुष्पेश पन्त ने हिस्सा लिया| सत्र का संचालन अनुवादक और इंडोलोजिस्ट जिम मेलिंसन ने किया| जिम ने योग और ऋषियों से जुड़े कई संस्कृत पाठों का अनुवाद किया है|

संडे सुबह भले ही हमें सुस्त महसूस होती हो लेकिन ये सत्र बहुत जोशो-खरोश से भरा रहा| दरअसल बिबेक देबरॉय और पुष्पेश पन्त न सिर्फ़ अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ हैं बल्कि बहुत ही बेहतरीन वक्ता भी हैं| बिबेक ने ‘महाभारत’ का अंग्रेजी में दस भागों में अनुवाद किया है और वो ‘वाल्मिक रामायण’ का भी अंग्रेजी अनुवाद कर रहे हैं| बिबेक की अनूदित ‘महाभारत’ को ऐतिहासिक और मिथकीय नजरिये से बहुत प्रामाणिक माना जाता है|

सत्र की शुरुआत में ही उन्होंने ‘पुराण’ का अर्थ स्पष्ट किया| पुराण का सामान्य अर्थ पुराना और साहित्यिक अर्थ ‘पुराना इतिहास’| उन्होंने पुराणों की कई श्रेणियाँ, और पांच लक्षण भी बताये|

संस्कृति और धर्म की गहन खोज करने वाले पुष्पेश पन्त ने पुराणों के बारे आम अवधारणा की बात करते हुए बताया कि “आम जन में इतिहास और मिथकों की सीमा खत्म हो जाती है, और वो हर चीज को पुराण मान लेते हैं| वो इसे उबाऊ शब्द से जोड़ते हुए अक्सर कहते हैं ‘ये क्या पुराण छेड़ दिया’ या ‘ये पुराण कब बंद होगा’|”

पुराण पर इन विद्वानों की चर्चा सुनने के लिए श्रोताओं में काफी उत्साह था| उन्होंने वक्ताओं से इस संदर्भ में कई सवाल किए जो जताते हैं कि पुराण या मिथक अब आम जन में कितना लोकप्रिय होने लगा है|

आम जिंदगी में पुराणों की प्रासंगिकता के सवाल का जवाब देते हुए बिबेक ने बताया कि हम रोजमर्रा के कार्यों में कई ऐसे काम कर रहे हैं जो पुराणों से ही लिए गए हैं और जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं| “रोज घरों में पढ़ा जाने वाला चंडी पुराण मार्कंडेय पुराण का ही भाग है… अंतिम संस्कार की प्रथा गरुड़ पुराण से ली गई है|”

लोगों की पुराणों में बढाती इस दिलचस्पी पर मुझे ऐसे ही किसी सत्र में कही गई देवदत्त पटनायक की बात याद आती है, “जिस सवाल का जवाब विज्ञान नहीं देता उसके लिए इंसान अध्यात्म की शरण लेता है|”

तो ऐसे ही अनेक सवालों का जवाब हम सभी अपने-अपने तरीकों से ढूंढ रहे हैं और मिथक की लोकप्रियता की भी यही वजह है|

 

Photo Credit: Rajendra Kapoor

 

 

Share this Post:

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*
*