थिंग्स टू लीव बिहाइंड: वो सब जिसे पीछे छोड़ देना चाहिए

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नमिता गोखले संग संवाद मृणाल पांडे एवं सुनील सेठी

प्रायोजक: एमिटी यूनिवर्सिटी

 

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

 

नमिता गोखले कई प्रतिभाओं की धनि हैं| वे भले ही जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की निदेशक हैं, पर उनकी पहली पहचान एक बेहतरीन लेखा के रूप में है|  उनसे बेहतर कुमाउनी जीवन को शायद ही कोई लिख पाया हो। नमिता का अपना बचपन कुमाऊं की घाटियों में बीता है। उन्होंने अपने इसी बचपन से, और कुमाऊं के अपने जीवन से जाने कितने खूबसूरत किरदार निकाल कर अपनी हिमालयन सीरीज़ में उकेर दिए हैं।

उनकी हिमालयन सीरीज़ की तीसरी किताब “थिंग्स टू लीव बिहाइंड”- वो सब जो पीछे छोड़ देना चाहिए पिछले साल दिसंबर में आई थी।

इस किताब पर बात करते हुए उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक और अपनी बहन मृणाल पण्डे से कहा, “कहानी का संस्कार मुझे आपकी माँ से मिला है। उन्होंने मेरा अन्नप्राशन करके मुझे शब्दों से हमेशा के लिए जोड़ दिया। ” मशहूर लेखक शिवानी द्वारा अपने जन्म के बाद अपनी जीभ पर सरस्वती लिखे जाने के बारे नमिता की यादें मार्मिक थीं।

मृणाल और नामिता एक साथ जनकपुर में बड़े हुए। सुनील सेठी को अपने बचपन के किस्से बड़े खुले मन से बताते हुए दोनों ने कहा, “कुमाऊं में हरकोई एक दूसरे का रिश्तेदार है। सारा जनकपुर एक दूसरे को जानता था। इसीलिये अपनी बदमाशियों के लिए हम पकड़ ही लिए जाते थे।”

नामिता की कहानियों के अमूमन सभी किरदार उनके आसपास से आते हैं। इस बारे में मृणाल बताती हैं, “परिवार में सभी को डर लगा रहता था कि कहीं अब इसने हमारे बारे में तो कहीं नहीं लिख दिया।” मृणाल और नमिता ने अपने समयों की रीतियों के बारे में कहा कि जहाँ एक ओर ब्राह्मण खाना बनाने के लिए एक अलग धोती रखते थे वहीँ बिन-ब्याही लड़कियों को खाना बनाने की मनाही थी। अपने घरों के इस अजब-गजब खुलेपन ने, पढ़ने लिखने के कल्चर ने, और सबसे ज़रूरी- समाज में हर एक को बराबर सम्मान देने के संस्कार ने दरअसल उनकी लेखनी को गढ़ा है।

नामिता गोखले अपने शब्दों से एक कहानी नहीं लिखतीं, एक पेंटिंग बना देती हैं। उन्होंने अपनी पहली हिमालयन सीरीज़ की किताब 24 साल पहले लिखी थी। उनकी हालिया किताब अपने आप में अलग है।

इस किताब की पृष्ठभूमि 1840 से 1912 के बीच की है। ये काल भारतीय इतिहास के लिए बहुत मत्वपूर्ण है। 1857 का ग़दर के साथ उन्होंने किस खूबसूरती के साथ कुमाउँनी विश्वास को एक साथ धागा-धागा बाँधा है, ये अविश्वसनीय है।

नामिता की लेखनी की सबसे खास बात उनके महिला किरदार हैं। हर एक अपने आप में इतना सशक्त है, कि पाठक इन किरदारों से हिम्मत ले सकते हैं। इस बारे में नामिता का कहना है, “ये कुमाउँनी औरतें मेरे आस-पास की हैं। मैं इनके साथ बड़ी हुई हैं। आपको जानकार हैरानी होगी कुमाउँनी औरतें मर्दों से ज़्यादा संभली हुईं थीं। वो उस दौर में भी मदिरा पीते डरती नहीं थी। उनकी अपने अंदर की ताकत कमाल की थी!”

नामिता के हर लेखन में मिथक कहानी में घुलते हैं और कहानी मिथक के रंगीन में संवरती है।

सुनील सेठी के ये पूछने पर कि जहाँ उनकी पहली किताब पर लोगों में खासा नाराज़गी थी, उनकी इस किताब को काफ़ी प्रेम मिला है, नमिता कहती हैं कि ये उनके पाठकों का प्यार है। 24 सालों में वक़्त भी बदलें हैं। वो खुश हैं कि सोच बदली है।

शायद पाठकों ने भी कुछ चीज़ों को बीतते वक़्त के साथ पीछे छोड़ दिया है।

Photo Credit: Rajendra Kapoor

 

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