जयपुर साहित्यिक उत्सव: प्रधान उद्घोष

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गुलज़ार एवं एन वॉल्डमैन

वृषाली जैन, अधिकृत ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

“मैं उस ऊंची कुर्सी पर बैठते हुए घबराता हूँ जिसपर पाँव लगते नहीं ज़मीन पर| आपके पाँव तो नहीं मैले होंगे लेकिन जब पांव मैले नहीं होते तो कलम भी स्याही चखना बंद कर देते हैं|”

ये अल्फ़ाज़ हैं गुलज़ार साब के जिन्होंने जयपुर साहित्यिक उत्सव का आगाज़ करते हुए कहाँ कि उन्हें कहीं का भी मुख्य अतिथि होने से घबराहट होती है| वो इतना ऊंचा नहीं उठाना चाहते कि अपनी मिटटी की, अपनी ज़मीन की असलियत से दूर हो जायें| अपने आप में लेखनी की एक संस्था माने जाने वाले गुलज़ार साब ने कहा कि जयपुर साहित्य उत्सव में हर साल इतना बड़ा युवा मजमा देखकर उन्हें बड़ा अच्छा लगता है| अच्छा लगता है कि युवा पीढ़ी आगे बढ़कर साहित्य के लिए इतनी दूर-दूर से आती है|

पर साथ ही लेखकों से सीधे तौर पर यह भी कहा कहा कि ये समझना ज़रूरी है कि वो लिख कर किसे बहला रहे हैं? खुद को या दोस्तों को या लोगों को? एक अकेला इंसान कभी किसी समाज को नहीं बहका सकता| समाज का अपना एक “मजमुई शउर” है जो लेखक को बहकने नहीं देती| हर लेखक की ये ज़िमेम्दारी है कि वो समझे कि वो क्या लिख रहा है, क्यों लिख रहा है?

गुलज़ार खुद एक चलती-फिरती नज़्म हैं| और नज्मों के इस बादशाह ने अपनी बात भी नज़्म के ज़रिये ही कही| उन्होंने कहा कि लेखनी वो भाप है जो चूल्हे पर चढ़ी हांडी की ढकनी को नाचने पर मजबूर कर देती है| जब अन्दर इतना भर जाए कि लिखना ज़रूरी हो जाये, लिखा तभी जा सकता है| उनकी आवाज़ में डूबा साहित्य उत्सव खुद में झाँकने को मजबूर हो चला था|

गुलज़ार साब ने कहा कि ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल न ही केवल इस देश का सबसे बड़ा साहित्यिक उत्सव है बल्कि इसमें हिन्दुस्तान की अपनी विविधता झलकती है| ये हमारे त्योहारों की संस्कृति में एक नए त्यौहार का- किताबों के त्यौहार का- चलन चलाने में कामयाब हुआ है|

भारत की विविधता की बात हो और भाषाओँ का ज़िक्र न हो, ये मुमकिन नहीं| गुलज़ार साब का कहना था इस वक़्त वो पूर्वोत्तर भारत की शायरी की किताब पर काम कर रहे हैं और वो गर्व महसूस करते हैं कि इतना खूबसूरत काम हो रहा है| उनका मानना है कि क्षेत्रीय भाषाओँ को दोयम दर्जे पर रख कर उनके साथ निहायत नाइंसाफी होती है|

ऐसे में अनुवादक की भूमिका बहुत ज़रूरी हो जाती है|

एक संस्कृति से दूसरी में साहित्य का आदान-प्रदान बेहद ज़रूरी है ऐसा एन वॉल्डमैन का भी मानना है| एन एक परफॉरमेंस पोएट हैं जो अपनी कविताओं को गाकर, भाव-भंगिमाओं के साथ सुनाती हैं| अपनी कविता ‘अन्थ्रोपोसीन ब्लूज़’ में उन्होंने एक ऐसे बिखरते समय की बात की हैं जहाँ कुछ भी इंसानी हाथों में रहा ही नहीं है|

वो उस समाज से डरती हैं जहाँ सिर्फ अँधेरा है, खून है तबाही है| उन्होंने कहाँ वो जयपुर का प्रेम पाकर अभिभूत हैं, खुश हैं कि उनके सीने में धड़कन है और रगों में खून दौड़ रहा है| उनका कहना था कि हम अब सत्य के बाद के दौर में जी रहे हैं| इस छलावों से भरी सियासत में अंधेरों को पीछे धकेलना हमारी ज़िम्मेदारी है|

अपने उद्घोष को चेंग्रिज़, जो बुद्ध की दया का प्रतीक हैं, के सिद्धांत को उन्होंने मन्त्र की तरह बार-बार बस यही दोहराया, “अंधेरों को पीछे धकेलें, आओ अंधेरों को पीछे धकेलें!”

 

Photo Credits: Rajendra Kapoor

 

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