ग्लोबल हिंदी: द देसी डैस्पोरा

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अनु सिंह चौधरी, दिव्या माथुर और नन्द किशोर पांडे संग संवाद फिलिप ए. लजेंडोर्फ़

 

उर्मिला गुप्ता, ऑफिशियल ज़ी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ब्लॉगर

 

जयपुर साहित्योत्सव के दसवें संस्करण का आगाज शिलोंग चैम्बर कॉयर की मन के तारों को छेड़ जाने वाली धुनों के साथ हुआ| उसके बाद हर दिल अजीज़ गुलज़ार साब ने साहित्योत्सव का उदघाटन वक्तव्य दिया| “मैं उस ऊंची कुर्सी पर बैठने से बहुत घबराता हूँ, जिसमें पाँव नीचे नहीं लगते ज़मीं पर… और पैर ज़मीं पर रहना बहुत ज़रूरी है|” इस एक उद्धरण से गुलज़ार साब ने न सिर्फ़ अपनी विनम्रता व्यक्त की बल्कि ज़िन्दगी का अहम सबक भी दे दिया| जयपुर साहित्योत्सव के दसवें संस्करण पर उन्होंने अपनी तरफ से गुजारिश की कि दस के बाद जुड़ने वाले हर साल में हिंदुस्तान में बोली जाने वाली अनेक बोलियों में से कम से कम एक बोली या भाषा को साहित्योसव में प्रमुखता दी जाए|

तो मानो उनकी बातों को सिर आँखों पर रखते हुए उदघाटन सत्र के बाद अगला सत्र सुनने के लिए मैं दरबार हॉल की तरफ चल दी| वहां “ग्लोबल हिंदी” सत्र आयोजित था| हॉल में घुसते ही मंच पर एक अंग्रेज सज्जन को खूबसूरत हिंदी में बात करते देख मेरी खुशी और बढ़ गई| बोलने वाले सज्जन सत्र के संचालक थे, जिनका नाम फिलिप ए. लजेंडोर्फ़ था और वह काफी सालों से शिकागो विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ा रहे थे| फिलिप ने काफी साल बनारस में रहकर रामचरितमानस का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया है, और उनके मुँह से हिंदी को दुनिया की तीसरे नंबर की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा सुनकर हॉल में उपस्थित श्रोताओं ने खूब तालियाँ बजाईं| पैनल में उनके साथ केन्द्रीय हिंदी संस्थान के प्रतिनिधि श्री नन्द किशोर पाण्डेय, पिछले काफी सालों से लंदन में हिंदी पढ़ाने वाली दिव्या माथुर और कहानीकार व फिल्मकार अनु सिंह चौधरी शामिल थे| तीनों ने ही हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार और उसके कारणों पर अपने-अपने अनुभव श्रोताओं से साझा किए|

नन्द जी ने बताया कि कैसे केन्द्रीय हिंदी संस्थान को 1960  में, आगरा में एक स्वतंत्र सेनानी ने भारत सरकार के साथ मिलकर स्थापित किया था| इसका पहला उद्देश्य अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था करना था| उन्होंने गर्व से बताया कि केन्द्रीय हिंदी संस्थान भारत का ऐसा एकमात्र केन्द्र है, जहां इतनी बड़ी संख्या में छात्र एक ही भाषा पढ़ने के लिए आते हैं|

दिव्या माथुर ने अपनी किताब “देसी गर्ल” से बात शुरू की, ये उन विदेशों में रह रही उन लड़कियों की कहानी है जो अपनी जड़ों से नहीं कट पाई हैं| उन्होंने श्रोताओं को पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से विदेशों में पैर पसारती हिंदी के बारे में भी बताया| उन्होंने बताया कि बीबीसी हिंदी ही एकमात्र पहला हिंदी पोर्टल था|

अनु सिंह ने अपनी यादें, अपने अनुभव साझा करते हुए बात शुरू की| उन्होंने बताया कि बचपन में जब वह अपने विदेशों में रहने वाले रिश्तेदारों से मिलती थीं, तो वो हैरान रह जातीं कि “हमसे ज़्यादा विदेशों में रह रहे हमारे लोग हमारी संस्कृति व हमारी भाषा के प्रति ज्यादा सजग हैं|”

इस सिलसिले में उन्होंने अपनी समकालीन फिल्मों में दिखाए गए एनआरआई किरदारों का भी जिक्र किया, जिनमें ‘डीडीएलजे’ के बाउजी, ‘परदेस’ का ‘वतन मेरा इंडिया’ गाने वाला अरबपति भी शामिल था|

ये सभी किरदार विदेशों में रह रहे भारतियों की उसी कशमकश को दर्शाते हैं कि किस तरह वो अपनी भाषा को बस बचा लेना चाहते हैं| इसे सुनते हुए मेरा ध्यान अनायास ही ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर की अध्यक्ष प्रीति पॉल की कही उस बात पर गया, “बच्चों को स्कूल भेजने से पहले मैं किसी भी तरह 15-20 मिनट का समय निकालकर उन्हें हिंदी की किताब से कहानियाँ पढ़कर सुनाया करती थी, फिर उसके बाद स्कूल में वो फ्रेंच, अरबी व इंग्लिश पढ़ते थे| वो कुछ साल हम सबके लिए बड़े ही उलझन भरे थे लेकिन मैं कभी ये नहीं चाहती थी कि बच्चे अपनी भाषा ही न सीख पाएं|”

तो सबकी इस कोशिश में इंटरनेट की भूमिका भी बहुत मायने रखती है| सबने माना कि इंटरनेट ने भाषाओं के प्रसार में मुख्य भूमिका निभाई है|

सत्र की समाप्ति फिलिप ने विनयपत्रिका की इन पंक्तियों से की:

“सुजन समाज सकल सुखवाणी,

करहूँ प्रणाम सबहु हरि जानी|”

 

Photo Credit: Rajendra Kapoor

 

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